रंत रैबार ब्यौरो …..
(राकेश मोहन थपलियाल)
गढवाळी बोली-भाषा, कै भी जिला कि किलै नि हो, कागज पर लिख्यूँ सभी बिंग सकदान, खासकर पढयॉ-लिखयॉ लोग, तब चाहे वु माल्या मुल्क का होन या पाल्या मुल्क का, भले ही हमारा बोल्न-चाल्न का ढंग म थोडा भौत फर्क किलै नि रौ । वनि भाषा इतक्या सौंगी चीज भी नी जनु कि लोग समझदान, यांकु कारण यु छ कि हम एक जिला म भी कई अन्वारि कि भाषा बोल्दॉ। मसलन टीरी कु ही उदाहरण ल्या, यख लंब गौं, जौनपुर व देवप्रयाग क्षेत्र की बोलि म आप तैं बतेरु फर्क नजर आलु ? गढ़वाली बोल्न का ढंग [ DIALLECT OR SLANG], शब्दु का उच्चारण [PRONOUNCIATION] म भी काफी फरक नजर औंदु, कभी-कभी त शब्दु कु अर्थ ही बदल जांदु ।
एक पुराणी कहावत छ कि आठ कोस पर पाणि अर दस कोस पर भाषा बदल जांदि, चला दस न सई पर सौ-पचास कोस पर त निश्चित ही बदल जांदि । हम सब्बी गढ़वालियों का बोलण-चालण, रीति-रिवाजु म भले ही कुछ अंतर हो पर हमारु आचार-विचार, सोच-समझ, मानसिकता, सभ्यता व संस्कृति एक ही छ । आज कु उत्तराखंड, गढ़वाल अर कुमाऊँ, दुई प्राचीन संस्कृतियों कु संगम छ । पुराणा राजा- रजवाडों का जमाना की छुईं बिसर जॉ त बाकी हमारु जीवन-दर्शन, जीवन-यापन कु एक ढंग अर समस्याएं भी एक ही जनि (घास,लाखड़ू,पाणी,पलायन, नष्ट होण लगीं खेती-पाती ) छन,बस सिर्फ भाषा व रीति-रिवाजु म ही जरा फर्क च । अब उत्तराखंड की उन्नति,विकास अर समृदिध् दुईयों कु संयुक्त दायित्व छ ।
गढ़वाली तैं बोलि से भाषा बणौण का प्रयास म अनेक विद्वान बरसू से कोशिश म लग्यॉ छन, पर गाड़ी सैद, तेरी कि मेरी पर अटकीं छ । निसंदेह, सबु तैं अपणी बोलि प्यारी होंदि किलै कि वा हमारी विशिष्ट सामाजिक पछाण, आत्म-गौरव व आत्म-सम्मान कु प्रतीक होंदि, बचपन से ही वा हम तैं घुट्टी म पिलाए जाँदी अर हम आजन्म ही वीं से जुड़यूं रणु चॉदा। यांक ही ये प्रश्न पर न कुई झुकणक तैयार छ न समझौता करण चॉदु । गढ़वाल क्षेत्र की विभिन्न बोलियों तैं मिलैक एक सर्वमान्य मानक गढ़वाली भाषा बणौण का मार्ग म शायद य ही सबसे बड़ी बाधा होली ? बोलि एक स्वतंत्र प्रवाह छ, जु बिना कै निश्चित रस्ता का, कै भी दिशा म उन्मुक्त रूप से संचार कर सकदी पर भाषा व्याकरण का बंधन से बंधी होंदि, वख शुध्दि-अशुध्दि कु नियम होंदु, जख म छोटि मात्रा लगौण त वख छोटि ही लगली । यांक हम मगन भी कै तैं त कुछ न कुछ त्याग करण ही पडलु, समझौता करण पडलु ,एक मानक-भाषा का प्रश्न पर, वैज्ञानिकता का आधार पर कुई आम राय कायम करण ही पडलि, तभी विद्वत जन कु यु प्रयास सार्थक होलु। हमारी सबसे बड़ी आशंका, एक भाषा का प्रादुर्भाव से अनेक बोलियों का विलुप्त होण कि छ, जु कि निर्मूल छ । हिन्दी
का मामला म भी या शंका थै पर वींका निर्माण का बाद, आज भी हिन्दी की अनेक उप-बोलियों म साहित्य सृजन कु काम बखूबी व बदस्तूर जारी छ । देर-सवेर शायद हम भी यीं बात तैं समझला । गढ़वाली का बोलि से भाषा बण जाण पर वींम अध्यन-अध्यापन कु मार्ग प्रशस्त ह्वे जालु ।
मेरा पिता स्व. श्री रामप्रसादजी थपलियाल तैं पढ़न-लिखण कु बतेरू शौक़ थौ, रूचि भी उंकी काफी परिष्कृत थै, जीवन जींण कु ढंग एकदम सहज थौ । मूलरूप से वु एक अध्यापक था, टीरी कु शायद ही कुई यनु कवि,लेखक,पत्रकार या राजनीतिज्ञ रै होलु, जैसे वु व्यक्तिगत रूप से परिचित नी रै होला, कई त उंका मित्र अर सहपाठी था । उंका पास ऊँसे भेंट म मिलीं अनेक गढ़वाली पुस्तकु कु संग्रह थौ । टैम पास का खातिर मैन भी वु पढ़िन, बाद म मै तैं नौकरी भी हिन्दी की मिली त हिन्दी का साथ-साथ गढ़वाली म भी हाथ अजमौण कि कोशिश करि अर मेरू यु प्रयास आप मैन मेरा कहानी संग्रह ” मेरु पहाड का नौ से पाठकों का सामणी रखी । अब काचु-पाक्कु जनु भी होलु ,आपकी सेवा म छ । पाठक ही तय करला कि यु खूब कि खराब ? नखरु होलु त माफ करद्यान। कथा-कहानियों का पात्र व कथानक कै स्थान विशेष का नि होंदान वुँकि विशेषता य होंदि कि वुंकू प्रभाव सर्वब्यापी अर सार्वभौमिक होंदु।
मनखी कै भी जाति, धर्म, समाज व देश कु किलै नि हो पर वैकु दुख-दर्द, कष्ट,पीड़ा, मन की सुखद व दुखद अनुभूति एक जनि होंदिन। कई कहानी काफी पैलि की लिखीं छन अर घटनाक्रम भी पुराणु छ, लेकिन आज भी आप यूंका पात्रों की उपस्तिथि तैं अपणा जीवन म या इर्दगिर्द अवश्य महसूस करला । रामलीला व टीरी-डाम कहानी का कई पात्र त असली छन या एक ऐतिहासिक घटना थै, जैकु दर्द टीरीवाला आज भी महसूस करदान। कहानी कु तानु -बानु बुणन व यथार्थवादी बणोण की खातिर कई नौ देणा जरूरी था पर उंकी अनुमति नि लिनि जैका वास्ता उंसे हाथ जोड़िक क्षमा-याचना छ, बाकी त कुछ सच्च अर कुछ कल्पना छ। शेष कहानियों का सभी पात्र काल्पनिक व लेखक का मन की उपज छन । रचना कु उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन छ ।
यु कहानी संग्रह वुं सब्बयों तैं समर्पित छ जु हमारा उत्तराखंड की महान विभूति छन, उत्तराखंड आंदोलन म संघर्षरत रया अर गढ़वाल की बेहतरी व गढ़वालि भाषा की समृधि , विकास व संरक्षण से कै न कै रूप से जुड़यां छन ।
