रंत रैबार ब्यौरो…..
विश्व की भौत सि भाषाएं आज विलुप्ति का कगार पर छन। गढवालि-कुमाऊंनी जौनसारी ये ही संकट से जुझणी छन। स्थिति य छ कि समाज अर सरकारी स्तर पर लोकभाषाओं कि उपेक्षा का चल्छ उत्तराखण्डै युवा पीढ़ी हैं यूं से अलगाव सि हवे ग्ये। स्थिति अगर समले नि ग्ये त यि द्विय भाषा दुलर्भ चीज्यू मा शामिल वेकि इत्सास बणी रै जौलि। हमर समणि एक भौत बड़ि चुनौती छ कि आखिर यूं लोकभाषों तैं कनक्वे बचै जाव।
य बात निर्विवाद सच छ कि ज्व रस्याण अपणि मातृभाषा मां औंद व हौर भाषो मा कतै नि ऐ सकदी। व भाषा ज्व कि मां का दूध का दगड़ि घुट्टी का रूप मा हमरा गल उतरे जांद, वे भाषा ज्व कि एक अबोध तैं सबसे पैलि मां बोनु सिखौंद व भाषा ज्व कि मां कि लोरी म सुणे जांद वींमा ज्व रस्याण औंद हौरूमा नि ए सकदी। एक बाद हौर बि छ। मातृभाषा का इतर भाषाों मा भले ही क्वी कथगा बि माहिर हवे जाव पर मातृभाषों रूप सिंगार अपणा आप मा अलग हि सौंदर्य ल्हेकि रैंद।
कैबि व्यक्ति की वास्तविक पछ्याणा वेकि भाषा ही होंद। भाषा का बिना संस्कृति की बात कन्न बैमानी होली। कैबि क्षेत्र व समाज की भाषा सामाजिक क्षेत्र की सभ्यता, संस्कृति, रिति रिवाज अर जीवन दर्शन का परिचायक होंदन। सबि जाण्दन कि उत्तराखण्ड एक विभिन्न भाषाई क्षेत्र छ। जैमा गढ़वलि अर कुमौनी द्वी भाषा बोन वला लोग सबसे जादा रैंदन। खेद कु विषै छ कि आजादी से पैलि बटी ल्हेकि आज अलग पहाड़ी राज्य गठन का बाद तक यूं भाषणों कि अनदेखी कर्य ग्ये। नतीजों यो वे कि वु पिछने अर हौर पिछनै चल ग्येनि। यो हि न वून अपणि मूल धरती मा बि अपण होणै पछ्याण ख्वै ये। आज जब हमरू उत्तराखण्ड बणीगे तब भी हमरि भाषा अपेक्षित छ। उत्तराखण्ड मा हिंदी प्रथम भाषा छ, अर संस्कृति हमरि द्वितीय भाषा छ यख हमरि भाषाओं कु स्थान नी छ। आज गौं क्षेत्र मा बि क्वी अपणि मातृ भाषा बोन्नमा खुशी य स्वाभिमान मैसूस नि कों। यी बजै छ कि यि द्विय भाषा अपणु अस्तित्व बचौणो संघर्षरत छन। लुहाप्राय होणै स्थिति से कुमौनी-गढ़वलि हि नि छन बल्कि दुन्य कि सैकड़ों भाषों पर अस्तित्व को संकट छ।
आज जर्वत यीं बातै छ कि मातृभाषों का सवाल पर गंभीर मंथन अर चिंतन कर्य जाव। यो हि न वेका संदर्भ मा प्रयोगिक रूप मा बि काम कर्य जाण चयेणा छन। यांक वास्ता समकालीन रचनात्मकता हैं वि ये चिंतन से जोड़ी चले जाण चयेणू छ। वास्ता मा गढ़वलि-कुमौनी अपण घर बटी हि उपेक्षा का डाम सैणी। जनि-जनि हमर मन बटी पर्वतीय होणो भाव खत्म होंद जाणू छ वुनि हम अपणि मातृ भाषा से बि दूर होंद जाणा छां। बल्कि अगर यो बोल्ये जाव कि पैलि हमुन मातृभाषा कि दुर्गति करे अर बादमा पर्वतीय भावना को परित्याग करे। हमरा गौं अर ग्रामीण पहाड़ी सोच से दूर होणा छन त यां का क्या कारण जिम्मेदार छन यां पर विचार कर्फ्यू चैणू छ।
बोनो मतलब यो छ कि गढ़वलि-कुमौनी अपणों का बीच अपणै घर मा बिराणि होयीं छन। मुंबई हो चै ग्वालियर, दिल्ली हो चै जयपुर भटिण्डा हो चै अमृतसर सबि जगों पहाड़ी मूल यानि उत्तराखण्डयोंन एक जुट संगठन बणयां छन। यि संगठन हर तीज तिव्हार पर गढ़वलि-कुमौनी व्यंजन पकौंदन। नाच गाण कर्दन, यो हि न जगा-जगा रामलीला नाटक आयोजित कैरी अपणा पहाड़ी समुदाय कि एकजुटता को परिचे देंदन पर अफसोस यी बतौ छ कि उत्तराखण्डै राजधानी मा यि मातृभाषा पुरी तरां उपेक्षित छ। न सिर्फ राजधानी बल्कि यूं भाषों पर गौं मा बि यूँको लग्यूं छ। घरा भितर एक गौंका लोग हिंदी बोली अफुर्ते खबनी क्य सिद्ध कन चांदन। गौं बटी अगर सड़क मा ऐ ग्रू त गढ़वलि वृंका गिच्चा बटी परेदशी वे जांद। खासतौर पर ज्वान पीढ़ी ये रोग से जादा पीड़ित छ। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का उपलक्ष्य मा हमतें सौं पैंटण चेणा छन कि हम घर हो चै भीतर दफ्तर हो चै बाजार, आपस मा गढ़वलि कुमौनी हि बोलला।
जरूरत छ मातृभाषा का प्रचार प्रसार वास्ता इमानदारी से काम कन्नै की। जथगा लोग बि गढ़वलि बोल-वींग सकदां अगर खुली सड़क्यों बजारूमा बेझिझक गढ़वलि बोल्नु शुरू नि करले तब तक कुछ होण्य नी छ। अगर ज्वान नौना-नौनि गढ़वलि बोली मा विचारू को आंदान प्रदान कनौ मन बणै दद्याला त वो दिन दूर नि कि हम गढ़वलि बोन अर होण, मा अफुतै गौरवान्वित मैसूस कन बैठ जौला। जर्वत यीं बातै छ कि हम अफुत गढ़वलि बोलां हि अपणा बच्चों दगड़ि बि गढ़वलि मा बात कनौ मन बणावा। कखि यो नि हो कि बच्च जब बड़ा होवन त हम पर यो इल्जाम नि लगावन कि ब्वे-बाबुन हमतें कबि गढ़वलि सिखै हि नी छ। यु अकाट्य सत्य छ कि भाषा ज्यूंदी रालि तबि हमरि संस्कृति बि ज्यूंदी रालि, ये वास्ता हमतै अपणी मातृभाषा बचाण वास्ता काम कन्न होलु।
