रंत रैबार ब्यौरो…..
मानवजीव संघर्ष का मामला मा उत्तराखण्ड का पहाड़ों कि जिंदगी एक अभिशप्त स्थिति मा छ। स्थिति या छ कि पहाड़ का लोग न त अपणि धरती छोड़ सकणा छन अर न वख रैणा मौका बण सकणा छन। जंगळी हिंसक जानवरों अर गूणी बांदर य सुंगरों न वखै खेती पाती तबाह कैरी रखये। अब लोग वख रावन बि त कनुक्वे। वखै जिंदगी मूल रूप से खेती पर आधारित छै पर अब य बात भूतकाल कि होंद जाणी छ।
हाल ही मा पोखडा विकास खंड मा एक चार साला का नौना तैं गुलदार न मारि दे, वखि चंत्रा टिहरी गढ़वाल मा रिख कु आतंक व्याप्त छ। काशीपुर क्षेत्र मा गुलदार एक बच्चा तें उठै कि लेगि। यिना उदाहरण मैना मा पांच-सात दां समणि ऐ जांदन। दशकों बटी पहाड़ यिनी घटनों से त्रस्त छ। हुक्मरान यो सब देखी चुप छन। आखिर पहाड़ तैं यूं हिसंक जानवरों का हवाला किलै करे जाणू छ।
प्रदेश कि जनता द्वंद्व मा छ कि आखिर वृंको दोष क्या छ। अपणि धरती मा रैकि कुछ कनै कोशिश चूंकि मजबूरी त नी छ। य बात नी छ कि सरकारो न पहाड़ों मा बुणचैरू का हिसंक प्रदर्शन तें नियंत्रित कनो नियम कानून तयार नि करनि पर सरकारी अमला कि क्षीण इच्छा शक्ति का चल्द वो नियम कैदा सिर्फ घोषणों तक हि सीमित हवेकि रै ग्येनि। आज प्रदेश तैं अस्तित्व मा अयां 25 साल ह्वे ग्येनि पर यी तर्फ अब तक कि तमाम सरकार वुनै पीठ कैरी शासन चलौंद औणी छन। नतीजा यो छ कि स्थिति बद से बदतर होंद जाणी छ। स्थिति से क्षेत्र का जनप्रतिनिधि ढंग से परिचित छन पर चूंकि तर्फ बटी न क्वी आश्वासन दिये जांदो अर न वो अफु यीं समस्या से निबटणो क्वी रणनीति बगैंदा। हालात यि छन कि वखा लोग्वी दिनचर्या यांसे बुरी तरां प्रभावित होणी छ।
सरकार बोनी बल भेड़-बखरा पालन कैरी अपणि जीविका मा सुधार ल्यावा पर वो नि जणदी य जणना बाद वि अजाण बणनो
नाटक कनी छ कि यि जीवन जब तक जंगळ चरनो नि जाला तब तक बूंको पालन नि ह्वे सकदो। यो बि कि अगर जंगळ मा एक जीव बि गुलदार न अपणु शिकार बणै ये त वेकि आर्थिकी का आधार पर सवाल उठणा शुरू ह्वे जांदन। भले सरकार पशुपालन तैं ये मामला मा मुआवजा आवंटित कैरी अपण कर्तव्य कि इतिश्री कर देंद पर यांसे पूरा व्यवसाय पर हि सवाल उठ जांदन।
प्रदेश का राजाजी पार्क अर कार्बेट पार्कों से लगीं मैदानी बस्त्यूं का वास्ता बि बाघ, हाथी, रिक जना जीव आफत का कारण साबित होणा छन, वो जब लोग्वी गन्ना का खेत उजाड़ देंदन य फिर खड़ी धान अर ग्यों कि खेती कुर्ची किसाणों कि मेहनत पर पाणि फिरै दिंदन। हाथी उत्पात मचौणा रैंदन। बोले जांद कि वृतै ढोल-कनस्तर बजैकि जंगळ कि तर्फ खदेड़ द्या। वो यिनु बि कैरी अपणि ज्यान बचै सकदन पर वेंको जो नुकसान होंद वांकि भरपायी कनुक्वे करे जै सकद सरकार त औणा-पौणा दाम देकि चुप लगै जांद पर सवाल यो छ कि य स्थिति कब तक रैलि, क्वी सर्वसम्मत हल किलै नि निकळे जांदो।
दरसल सिस्टम अर आम जनता का वास्ता य समस्या तातु दूध साबित होणी छ। सरकार तैं जीव जंतुओं को कुनबा बढ़ौणै चिंता बि छ त आम जनतै फजीहत से निबटणो उयार कनै जिम्मेदारी बि समस्या बणी खड़ी होयीं छ। यिनि स्थिति मा शासन का समणि घंगतोळ पैदा होंद जाणू छ, वो य त जंगळी जनवरों को सफाया कनौ आदेश ये द्या पर फिर मनख्यूं अर पालतू जानवरो तें वृंका हवाला कर द्या। जर्वत यी बातै छ कि सरकार समावेशी नीति तयार करो जांसे कि जानवरों कि सुरक्षा हवे साक अर मनख्यूं कि ज्यान खुण बि आफत नि आव।
