रंत रैबार ब्यौरो….
उन त पैली हर द्वी तीन मैनों मा गाँ आंणु जांणू लंग्यू रैन्दु छाई। अब बगत अर परिस्थिति बदल ग्याई त गौं आंणू जांण बि कम है ग्याई ।
कुछ दिन पैली कुटुम्ब मा एक ब्यो छाई अर ब्यौ गाँमा है त हम सब्बि भै वैणां मिलो । अहा ! एक हफ्ता कन बीति पतै नि चलु।
सब्बि भै बैणा जु वर्ष बटि नि मिला आज मिलो अर मिल्दा बि कनववै सब्यूंकु एक अलग शहर अर उख अपणी दुन्या। जैकी जन हैसेत वैकी वन दुन्या वनि उठण बैठणं । बस इन चितावा कि हमरा रिश्ता फौन तक ही जुड्यां छाई। आज जब मिला छौ त क्वी ब्वनू अहा स्यखमै है लिम्बा की डाळि त क्वी ब्वनू ये छज्जा मा ददि कन गाळि दीन्दि है हैं कि धुधराट मचाणां छौ नि रखणै स्य कूड़ि तुमुन ।
आज इन कुछ निरयूं छाई ज्यांथै इन ब्वले जा कि यु अपणु च। जु अपणु छाई वो त खंद्वार हुयूं छाई ।
आज सुन सान बौरान ड्यारमा यखुलि बैठि कन बि एक अलगी शान्ति मिलणी है। जरा जरा सर्र सर्र ठंडी हवा हरकण बैठी त. इन लगि जन जन मेरी ब्वै मेरी काफी बोड़ी प्यार मुन्ड मलासी कन ब्वनी हैली व्यटा धीरज धैर सब ठीक है जालू । उदास न हो एक दिन फिर वो पुराणां दिन लौटी कन आला ।
जनि तेज घामै चटाग लगि त इन लगि जन बड़ा बुजुर्ग मौर्थे दल्काणा (उंटणा) ह्याला कि चल भितर हम छौ त्वै दगडि फिकर नि कैरि ।
जब डाटों का छैलू बैदु त इन लगि जन म्यारा पुरणां दगड्या मिलि गे होला। वो डाळा जन ब्वलेन्द मी दगडि छुई बात लगाण बैठि गे होला। जन वो बताणां ह्याला कि कु अयूं छाई कु जयूं छाई । कबि पत्ता खुशि मा हलण बैठि जांणा त कबि
चुप है जांणा । जन ब्वलेन्द मि दगड्यों का बीच बैठ् ? यूं होलू । अहा। एक अजीब किसमौ आनंद ।
राति कु अंध्यारू अर हम चौक मा बैठ्यां इन लगणं छाई जन जून बणि कन ददि ऐ होली अर ब्वनी हैली जन बचपन मा ब्वल्दी है चलो भितर अंध्यारु है ग्याई बाघ ऐ जालू । ।
सुबेर जब घाम का दगडि जब गैत झझरांण वळि ठंडी हवा चलि त इन लग जन म्यारु बबा म्यारु गाळु भिटे कन ब्वनू हालू कि ब्यटा अफु चैं दोष न दे। पलायन। करण क्वी बुरि बात नीच । हरै उल्टां खुश हो कि बिरणा मुलुक भी तुमुन अपणी लगन मीनत अर प्रेमी सुभौ से अपणु बगै यालि । लोगु चैं ब्वलण दे ब्यटा तुम पलायन कैरि ग्यो किलैकी कि तुम चैं एकी संस्कार मिल्यूं छाई ईमानदारी अर मीनत कु । नथर जु ई तुमखुणै पलायनवादी ब्वना छन वो इख धरती से प्रेम करण वळा नि छन वो ब्योपरि छन ।
तनि एक घुघती उड़ि कन आई अर मि पुराणि यादों बटि भैर निकली कन चौंकि ग्यो। वा घुघती घिन्डुड्यू का दगड़ि
है फुर्र फुर्र उडणी। आज बि कुछ नि बद्ल्यूं छाई ।
म्यारु गाँ छुड़णा का बाद भी भौत कुछ बाकी रयूं छाई इख। देखा धर्धी म्यारु पुस्तैनी घार आज भी मेरि यादों मैं सम्हळणु च। वो चौक का ढुंगा जाँमा मि बचपन मा झंणि कतगा दौं लमड्डु पर एक दा भी मी फरि चोट फटाक नि लगि । कतगा अपणु पन च यूं ढुंगौ मा 7
सुबेर जांद बेर हर कैका मन मा हलचल है। मन मन मा हर क्वी रुणूं छाई सब्यूं थै पता छाई कि लाखों की कोठि बि हमरा यूं उबरौं का बरोबर नीच। जिन्दगी भर कमै कन बि वा आजादी नीच जु यूं पुंगड़ौ सग्वडौ च। अमीर हो या गरीब कै कै मजबूरी का कारण छुड़द नथर त वो जांद बेर इतगा रुंदु किलै ?
मिन सोचि क्वी इन ब्वल्दु न कि अब नि जांण शहर इखि रौंला। कतगा सुन्दर है जालू जीवन एक दौं फिर । तनि श्रीमति जी की आवाज ऐ इना सूंणों चलो फटाफट बंद कारी तौं किवाड़ लगावा ताळु अफार वळू भै च लगाणूं। चलो फटा फट । मिन ताळु पखड़ी त वो हँसणं छाई अर गाड़ी
व्वनू रो ना बस आंणू जांणू रै ह्या मी भि अपणी साँजड्या वर्वी चाबी बिगैर नि रै सकदु । मीर्थे वि बोंकि खुद लगद ह्या हमर्थं मिलाण का बाना ऐ पर ऐ जरूर । म्यार आंखौ अंसधरी अर हथ कौंपणां । तनि म्यारु नौनु ब्यनू पापा चलो ना लेट हो रहा है। अभी बीच बीच में हमें सेल्फी भी लेनी । वो गुमखाल के पास से पहाड़ों का व्यू वाउ अमेजिंग। वहां वीडियो बनायेंगे। चलो न पापा आप तो ऐसा सोच रहे हो जैसे न जाने आपका क्या छूट रहा हो।
मि हँसु छौ अर मन मन मा स्वचणू ब्यटा त्यार दिखण से मि प्यार सब कुछ शहर मा च इख कुछ नीच । व्यटा त्वै क्या पता मि जब पैलि दिन ये गाँ बटि ग्यौ तब बी अर आज बी भौत कुछ छोड़ी जांगू छौ जैकि कीमत तुमुन क्य समक्षण पर फूको फुण्ड़। जरा काका ब्याडों का ताळा वि देखि आवा नवां क्वी द्वार ड़कण भूलि गे होलू ।
चलो ढाको द्वार चलो। तैं खंद्वारीका किवाड़ बि बैंकि दया।
