नयी दिल्ली। गढ़वाल भवन, दिल्ली मा मासिक साहित्यिक संगोष्ठी दैणि ह्वे, ज्यांमा गढ़वळी का जण्यां-मण्यां हस्ताक्षर जस्यळा (यशस्वी) कहानीकार जबर सिंह (ग्राम – मल्ली रिंगोली, पट्टी लोस्तू, जिला – टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंडाऽ रैबासी अर अचकाल नौएडा, उत्तर प्रदेश का प्रवासी) तँ गढ़वाली कान्यूं तैं एक अलगी तरौं से रची – संवारिकै श्रीवृद्धि कर्न मा वृंका उत्कृष्ट जोगदान खुणि छटवों ‘साहित्य सम्मान’ प्रदान किये गे।
गढ़वाल भवन, दिल्ली मा थप्यर्थी श्रीलगुळि (मनीप्लांट) का सान्निध्य मा डॉ कुसुम भट्ट का मांगल गीत – ‘दैणो होयां मेरा खोली का गणेशा, दैणा होयां
मेरा मोरी का नरैणा’ का दगड़ आजोजन कु श्रीगणेश हे। 17 मई, 2026 की यींऽ मासिक साहित्यिक संगोष्ठी, दिल्ली मा डॉ कुसुम भट्ट का उपनाप ‘सोभनी’ कु
अलंकरण ह्वे। अहा ! कन भलो नौ च ‘सोभनी’।
बतै द्यांकि सोभनी नौ बूंकी माताश्री को दियूं नौ च। वृंका गौं मा वृतें सोभनी बोलि पुकर्दी। आशा ममगाई की पुस्तक’ कल्यो’ माज्वा बिगरैळि बांद जिकुड़ी मा कलकळि लगाणि च, वा सोभनी हि च। आशा करदाँ कि जल्दी डॉ कुसुम भट्ट ‘सोभनी’ की
‘सोभनी’ उपनाम से गढ़वाली साहित्य सृजना हम सब पाठकों का समणि आलि। जी रयां, जागि रयां, तुम जुगराज रयां सोभनी जी।
संगोष्ठी का पैला सत्र मा पजल यात्रियों द्वारा मई मैना (07-11 मई 2026) मा पुरयीं पांच दिवसीय जौनसार बावर यमनोत्री क्षेत्र विशेष की 9वीं अर 10वीं द्वि अष्ट धाम (यानी 16) पजल यात्रा पर डॉ यात्रा का सोला धामों पर अपणि समलौण्या पृथ्वी सिंह केदारखंडी जीन पड़ौ दर पड़ौ (संस्मरणात्मक) सारसगोर्या (सारगर्भित) बात रखी।
पजल यात्रा का आंख नाक कान, छन सुशील बुड़ाकोटी ‘शैलांचली’ युधिष्ठिर समान। बूंन हर पड़ौ धाम पर हजार ग्राम
हजार धाम हमरी भाषा हमरी पछ्याण की बिनसरी सोच (परिकल्पना) अर सभी दस पजल यात्राओं का चार बिसी आठ धामों पर अपणि सारसगोर्या बात रखी बोलि कि जैन जौनसार नि देखी, वैन उत्तराखंड नि देखो। तऽ बल सौ सुनार की, अर एक लुहार की। शैलांचली की शैलवाणी कु लुहा, जौनसार की लोहारी अर कुमाऊं कु लोहाघाट भी मणदा।
चौहान की हिंदी काव्य पुस्तक ‘सुनो संगोष्ठी का दुसरा चरण मा कुसुम प्रियतम’ पर समीक्षात्मक साहित्यिक चर्चा हे। समीक्षा की मजबूत नींवधरै कैरिक डॉ कुसुम भट्ट ‘सोभनी’ न बोलि कि ‘सुनो प्रियतम’ एक मातृशक्ति का जीबनै हर पहलु की सशक्त इंटधरै च। कुसुम चौहान कु कविता संगै ‘सुनो प्रियतम’ अपणा आप मा नारी संघर्ष के कविता सार च।
डॉ पृथ्वी सिंह केदारखंडीन बोलि -संग्रह की आत्मा – सुनो प्रियतम। नारी शक्ति तैं केंद्रबिंदु मा रखी कवितं सृजना है। नारी तैं चितळो कन यींऽ पुस्तक कु सार च।
सुनो प्रियतम ! मेरे हृदयवृंत का राग सुनो/जो मिटा नहीं वो दाग सुनो – ‘तुमसे बस तुमसे ही’- यींऽ कुंआसी कविता तैं महेंद्र सिंह लटवालन जैं तरा से रुंवासा भौ मा गैयी, यनी लगि जन कुसुम की कविता कु कुसुम वाटिका मा नाटकीय मंचन होणु ह्वा।
जैं कविता तैं महेंद्र सिंह लटवालन रुआंसा हेकि बड़ा हि नाटकीय अंदाज मा बांचि, वीऽ कविता तैं
प्रज्ञा आर्ट्स की संस्थापक लक्ष्मी रावत जीन प्रेम भौ का रस मा आत्मसात ह्वेकि बांचि । एक ही कविता तैं द्वी पाठक अलैदा-अलैदा अंदाज मा गांदन, यऽ कुसुम कि कविता की असल बानगी च । वून बोलि कि द्वी दां कै सम्मान समारोह मा वून जज का तौर पर अपणि प्रिया शिष्या कुसुम तैं सम्मानित होणु सै निर्णय करी। वून ‘संभव न होगा’ कविता अपणा ही नाटकीय अंदाज मा बांचि – हर बार तुम्हारे मापदंडों पर खरी उतरूं, ऐसा तो संभव न होगा, सारे अधिकार भी तुम्हारे, सारे निर्णय भी तुम्हारे, ऐसा तो संभव नहीं होगा…। यींऽ कविता का माध्यम से आजै युग की मातृशक्ति पुरुष प्रधान समाज मा अपणा बरौबरी का अधिकार अर निर्णय की बात कर्दी।
जगमोरान बोलि जख तख कुसुम चौहान का काव्य संगै कि बात च, बल कुंडली क्या दिखणै ? मंडळी देखि ल्याजि। चंचल -शोक दुपट्टों को अजब शैतानियां/ खुली जुल्फों को बेफिक्र जवानियां। संगै कि पैलि कविता ‘अंगड़ाईयां’ की. यीऽ लैन बिंगे दींद कि नारी कि अंगड़ी का रंगों मा नारी कु सर्यो चरित्र चित्रण परिलक्षित होंद। धानी दुपट्टा धान कि फसल लहले दींद। बसंती दुपट्टा बंसत रितु तैं बौड्ये दींद। सुपेद रंग मिलीक दुपट्टा तिरंगा फैयें दींद। जुल्फों की आजादी एक दिन लदुळो कि उमरदराजी मा कैद ह्वे हि जांद।
