(दिनेश ध्यानी)
9 नवम्बर, 2025 खुणि उत्तराखण्ड प्रदेश अपरा पच्चीस साल की यात्रा म हिटणु छ। ये राज्य की परिकल्पना व अलग मांग का पिछ्नै तीन मुख्य कारण छाया। पैलु रोजगार दुसरु शिक्षा व स्वास्थ्य अर हमरि पछ्याण। यूँ पच्चीस सालों म हमुन क्य पै? क्या कै? ये परैं अमणि विचार कना कैकी मंशा नी। न जनता न नेता अर न सरकार। सब रंगमत हुयां छन। शहीदों कु बलिदान अर जनता कु त्याग कतगा सफल ह्वे? कतगा सुफल रै य बात विचारणीय छै पर ये पच्चीस साला जश्न देखि कि लगणु च कि सबकुछ ठीक च। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सब ठीक ही त चलणा छन। तबी ता जगा-जगा सि उत्सव अर गीत-संगीत की महिफल सजणी छन। सरकार से लेकि जनता सब रंगमत हुईं च। नथर कखि न कखि चिंतन होन्दु, विचार होन्दु अर कखि ता आंदोलन की आग बची रैंदी।
रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य की बात क्या कन? सब लोग जणदा छन। पर सबसे अहम् विषय हमरि पछ्याण छौ वे परैं हर तरफ बिटिन हमला हूणान। लेकिन हम लोग समझण नि चाणा छौ। नथर क्वी त अगनै आन्दु। पछ्याण से मतलब हमरि भाषा-साहित्य अर संस्कृति, रीति-रिवाज मुख्य छन। लेकिन आज उत्तराखण्ड खासकर पहाड़ की बात करदा ता हम हर क्षेत्र म रोज कुछ न कुछ खूणा छौ। यख बिटिन पलायन, बांजा पुंगडा अर बदल्दु परिवेश का कारण रीति-रिवाज़ बि प्रभावित हूंणा छन।
बात भाषा-साहित्य की करदा ता भाषा का खातिर भौत भलु माहौल नी। उत्तराखण्ड का गौं म बि गढ़वाली, कुमाउनी भाषा म बात कन वळा मठु -मठु कैकि कम हूणा छन। दुसरी बात राज्य बणणा बाद सरकारों न बि हमरि गढवाळी -कुमाउनी भाषाओं खुणि क्वी ख़ास पहल नि कैरी। पहल ता छोड़ा अब सरकारी आयोजनों म गढवाळी -कुमाउनी की बात बि नि कना छन बल वोट बैंक नाराज ह्वे जालु। हम स्वनामधन्य विद्वान्, भाषाविद अर साहित्यकार जु भाषा का पक्ष म अपणि सुविधानुसार छ्वीं-बात करदन। ज्व अफसोस की बात छ। झणि कै लालच म सब जाणी समझी बि चुप छन अर सत्ता की डिंडयाली म ठुमकणा रंदन। ता जै राज्य म हजार साल से पुरणी भाषाओं कु नाम लेणु बि खतरा से खाली नी वख वों भाषाओं की अकादमी कैन अर किलै बणौंण ? यी कारण च कि उत्तराखण्ड म उर्दू, पंजाबी, संस्कृत समेत कै भाषाओं की अकादमी फलणी-फुलणी छन पर गढवाळी -कुमाउनी कखि जगा नी ! विद्वान बुल्दन बल सरकार ल लोकभाषा समिति बणयीं। पर लगणू व समिति बि अज्यों लगणू माळलोग नि ऐ ? नथर कुछ न कुछ हरक-फरक अर झर-फर ता टकलगैकि हूंदु। पर क्या बुन? कैखुणी बुन? क्वी सुणदरू नी। या बात गढवाळी -कुमाउनी तैं संविधानै आठवीं अनुसूची म शामिल कना खातिर अज्यों तलक उत्तराखण्ड विधानसभा बिटिन एक प्रस्ताव पास कैरिकि केंद्र सरकार तैं नि भेजु हमरा भाग्यविधाताओं ला। जबकि लगातर प्रदेश सरकारों से हथजोड़ै हूणी छन पर हैरां जु कै उप्पन त तडकांदा।
अमणि ह्वेसकद यि सवाल कै तैं बि गौण लगि सकदन पर भोळ यि सवाल टक लगैकि समणि आला। तब यि सत्ताओं से अर ये दौर का भाषाई सरोकारों से जुड्यां मनख्यों से जवाब टक लगैकि मांगला। य बात कंदूड़ खोली सूणि ल्या। एक न एक दिन गढ़वाळि, कुमाऊनी भाषाओं ला संविधानै आठवीं अनुसूची म शामिल हूण। तुम कतगा बि षड्यंत्र कैरिल्या, बाटा बुजै ल्या, रोड़ा अटकै ल्या वै दिन तुमरि बि पछ्याण होलि, तुमरु बि इत्यास क्वी न क्वी ईमानदारी से ल्याखलु। किलै कि तुमरु गणित अर विधाता कु गणित अलग छ।
पच्चीस साल कु नौजवान उत्तराखण्ड सदन्नि कनु रालु बल भरमत म! कनु रालु बल अबोध। एक न एक दिन वु अपणां हका विकास कु हिसाब मांगलु। अपणि भाषा साहित्य व संस्कृति कु हिसाब मांगलु। वे दिन ज़वाब क्या देला? कनक्वे देला?? पर जवाब त देण पोड़लु। चुपचाप मनमर्जी कब तलक करणा रैला? ।
