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पहाड़ी जीवन को पुराणो वैभव वापस औण अब भौत मुश्किल छ। वैभव को तात्पर्य धन सम्पदा सि नी छ बल्कि वखै सांस्कृतिक सम्पदा अब शैद हि बौड़ सकलि। पहाड़ का हालात यि छन कि तेज़ी सि होण वळा पलायन का चल्द वखा लोगु को खेती से मोहभंग ह्वे गयें। जो लोग गाँ मा छै बि छन वो बि खेती नि कन चाहणा छन। यांका कथगै कारण छन। जौतें व्यवस्था कन वळा रोजाना द्यखणा छन पर उयार क्की नि कनू छ । अब सिंचै, तकनीकी अर भूमि व्यवस्था सुधार का मुद्दा हि ल्हिये जावन त प्रदेश का सम्बंधित विभाग कटघरा मां खड़ा मिल्दन। यांक अलावा जंगळी जानवरों को विस्तार बि वखा लोगु तैं खेती किसाणी से दूर कनमा खास भूमिका अदा कनू छ। सवाल यी उठणू छ कि वख किसानों आमदानी तब बढ़लि । जब वख मनखि होला । वास्तव मा राज्य का पहाड़ी क्षेत्रों मा कृषि आसमानी बरखा, सरकारी व्यवस्था अर जंगली जानवरों कि मोहताज छ।
राज्य बण्ना क 25 साल बाद बि स्थिति बेहतर होणा बजाय बदतर होंद जाणी छ। बोनो त पहाड़ी कृषि पर यूं 2५ सालों मा सैकड़ों करोड़ खर्च हवे चुकि ग्येनि। सिंचै योजनों पर बि करोड़ों खर्च हवे ग्येनि पर सब कागजों मा हि कैद छन। हालांकि रिकार्ड मा भौत काम ह्वे ग्ये पर धरातल पर अबि यि योजना वखै पणचरि खेती कि तीस नि गुंजै सक्य बरखा पर आधारित यखै खेती किसाणी सर्ग दिदा अपाणि-पाणि बोनी रैंद। अब सर्ग दिदै मर्जी छ कि तो वींकि पुकार सुणो य अनसुणी कर दिया। हालांकि व्यवस्था साक्यूं बटी चल्नी छ । सैकड़ों साल बटी वखा लोग खेती किसाणी कैरी अपणि गिरस्ती चलौंद औणा छा। पर आज वखौ मनखि वख रैणु हि पसंद नि करदो। समझाव-बुझाव बि त कनक्ले आज जबकि सब कुछ वैज्ञानिक अर तत्काल रिजल्ट देण वळि व्यवस्था छ पर वखौ किसान यांक तर्फ अग्रसर हि नि होण चाहंदो। कारण बथेरा छन अर समाधान बि मौजूद छन। वखा लौगु तैं वखै जिंदगी का प्रति उन्मुख कनौ अगर सरकारी मशीनरी मन ठाण ल्या त क्वी वजै नी छ कि नतीजा विलोम मिलला ।
पहाड़ का हर जिला मुख्यालै मा हर विभाग का दफ्तर छन । यख तक कि तैसील अर विकासखण्ड मुख्यालयों मा जनता खुण वो हर सुविधा तयार छ जांसे वखा किसान कि सोच कृषि का प्रति बदल सको पर वख सरकारी मशीनरी हि कुछ कन नि चाहंदी। कवि जमानु छौ जब कृषि विभाग का लोग गौं मा जाकि लोगु कि आर्थिकी सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन मा दिलचस्पी दिखौदा छा। कबि दयखे गये छौ कि धान कि पैदावार बढ़ौणो ब्लॉक बटी पैलि चीनी किस्म का सट्टि किसानों तैं बंटे ग्येनि जब बिज्वाड़ तयार हे ग्ये त ब्लाक का लोगुन रोपणी खुण तयार सेरों मा जैकि किसानों तै प्रशिक्षित करि छौ कि कनक्के वो लैनवार बिज्वड़ रोपन। यो हि न तब यिनु टैम बि छौ कि विभागीय स्टाफन पहाड़ी कराळा पुंगड़ों तै समतल बणौणो लोगु तँ मेढ़बंदी खुण प्रेरित करि यांसे लोगु तँ फैदा बि ह्वे। लैन मा रोपी बिज्वाड़ को फैदा जादा पैदावार का रूप मा मिलि। य परम्परा 25-30 साल तक चल्दी रये पर हर्बि-हर्बि यो सब इत्यास का पन्नों कि बात हेकि रै ग्ये। जौँ पुंगड़ों मा शानदार फसल होंदी छै वो अब कूड़ा करकट कि खेती से भयाँ छन। वास्तव मा कखि य कैबि व्यवसाय मा जब नयुपन नि आँदो त काम कन वळो उत्साह हर्बि-हर्वि कम होंद जांद। जरूरी छ कि शासन अर विभाग कि तर्फ बटी व्यवस्था मा बदलाव ल्हयूं चयेणू छ। खेती किसाणी का नया तरीका, तकनीकी बदलाव, खेती कि परिवर्तन, सम्बंधित नयि खेती खुण मिट्टी को परीक्षण, कृषि यंत्रों मा बदलाव अर ये काम कन वळों खुण बायो एग्रीकल्चर कार्यों कि व्यवस्था बि वखा लोगु तँ खेती का प्रति आकर्षित करे जै सकेंद। अब सैकड़ों साल बटी बी पुराणों हळ, वी बळ्द, नाडु निसड़ो अर वी पुराणो खेती को तरीका। कखिं त बदलाव औण चयेणू छौ। पर यिनु नि हे। कृषि विकास पर प्रदेश का सम्बंधित विभाग का अधिकारी सिर्फ बजट हड़प कनै सोच वळा रैनि। पहाड़ कि खेती का प्रति क्वी विकास कि सोच किसानों मा पैदा नि करे ग्ये। यीं उपेक्षापूर्ण नीति का चल्द वखौ किसान हाशिया मा ऐ ग्ये। अर हर्बि-हर्बि वखै खेती-किसाणी हाशिया मा ऐ ग्ये। दुन्य मा हर समस्या को समाधान छ। जर्वत छयां पर मनन कनै। प्रदेश का पहाड़ी क्षेत्रों कि कृषि का जैतें जंगली जानवर कबि पनपण नि देणा छन। हाडतोड़ मेहनत कैरी वखौ किसान खेती कर्द अर जब खेती अपण चरम पर पौछद त बांदर, सुअर वीं तैं बर्बाद कैरी रख दिंदन। जन कन त कति क्षेत्रों मा मोर खेती का दुश्मन बण्यां छन। यु सब बातौं पर विचार व मंथन कन्नै की जरूरत छ। तबि कुछ हे सकद।
