ऐ मा क्वी द्वी राय नी छ कि वन्यजीव पर्यावरण अर प्रकृति की अमूल्य धरोहर छन जौ कु संरक्षण अर संवर्धन सुबि कु दायित्व छ। ई दिशा मा सरकार भी गंभीर दिखेणी छ पर मानव-वन्यजीव संघर्ष रूकणो नौ नि लेणु छ।
पिछला दिनु वन्यजीव सप्ताह का मौका पर वनमंत्री न बोलि कि मानव वन्यजीव संघर्ष तैं कम कन्न हमरि सरकार की प्राथमिकता छ। वन मंत्री न बतै कि मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन योजना क अंतर्गत रैपिक रिस्पांस टीमों कु गठन करेगे। सरि ऊर्जा चालिक बाडों की स्थापना, राहत मुआवजा प्रक्रिया तेज कन्न अर जागरूकता कार्यक्रमों कु आयोजन कन्न जन कदम उठैगेन। वून यु बि बतै कि मानव वन्यजीव संघर्ष मा जनहानि होण पर मुआवाजा राशि 6 लाख सि बढै कि 10 लाख करैगि। दिखे जाव सरकार कु कदम सरहानीय छ। यासि पीड़ित परिवार तैं कुछ राहतं त मिलली पर मुख्य मुद्दा त वन्य जीव संघर्ष रोकण कु छ। वे का वास्ता कारगर कदम उठाणा होला।
दिखे जाव त जंगली जानवरों कि गौं शहरों मा घुसपैठिये आतंक कोटे वातावरण बण्द जाणू छ। पहाड़ हो चै मैदान सबि जगा गुलदार, बाघर कि दखल जब तक दूसखणो मिल जाणी छ। राज्य बण्यां आज 25 साल हवे ग्येनि पर कबि यीं तर्फ ध्यान नि ये कि वन्य हिंसक जीवों कि मानव बस्त्यों मा घुसी भय अर मौत को आतंक मचौणे समस्या का निदान खुण क्य करे जाण चयेणू छ। यख त हर टैम क्वी अनहोनी कि आशंका बणी रैंद। हालात बयां कना छन कि जैं रफ्तार से मानव-वन्यजीव संघर्ष कि घटना प्रकाश मा औणु नीति नियंतों खुण एक चुनौती छ।
सवाल यो छ कि जंगल कि चौखट नंधै कि यि हिंसक जीव मानव बस्तयों मा किलै औणा छन। एक सीधो सि जवाब होंद कि चूंकि जंगलों को कटान अर जंगली जानवरों का पर्यावास मा मनख्यों को अतिक्रमण यांकि वजै छ। पर असल बात कुछ हौर त नी छ। मनख्यों कि बस्ती मा घुसणु क्वी बि जंगली जानवर सही नि समझदो होलो। किलै कि मनखि हि वृंको सबसे बड़ों दुश्मन होंद यीं बात तैं वो जण्दा छन पर फिर बि शहरों कि घणी बस्त्यों मा गुलदार को प्रवेश शैद कुछ हौर हि तर्फ संकेत देणू छ। गुलदारों न शहर-अर गौं क्षेत्रों मा आतंक को माहौल तयार कर्फ्यू छ। खेत-खल्याण हो चै घर-गुठ्यार कखि बि लोग सुरक्षित नि छ। कब अर कख गुलदार समणि आकि चुनौती दे द्या कुछ नि बोले सकेंदो।
राजाजी नेशनल पार्क अर जिम कार्बेट पार्क को संधि क्षेत्रों मा बाघ को आतंक आम बात छ। लगभग रोजाना आम जनता मा वां यीं बातै सोच आम छ कि सरकार तैं वींकि रक्षा कि चिंता नी छ। वो सिर्फ हर्जाना देकि अपण कर्तव्य कि पूर्ति मान लेंद। जो कि जनता तैं सुरक्ष देणै शासन कि गारंटी को मखौल छ। क्षेत्रवासी पशोपेश किं स्थिति मा छन कि वो अगर हिंसक जानवरों तैं गोली मार्दन त जेल ह्वे जैलि अर अगर यिनु नि कर्दा त बूंकि जिंदगी कि गारंटी खत्म होंद। यीं दुविधा को निदान सिर्फ सरकार को छ। अगर वो हि जनता कि अनदेखी करलि त व्यथा कैतै सुणेलि। आंकड़ा बतौंदन कि राज्य गठन का बाद से अबि तक सैकड़ों लोगु कि ज्यान जंगली जानवर ल्हे चुकि ग्येनि। जबकि यांसे द्विगुणा घायल अर अंगहीन होयां छन। यानि जो मर ग्ये वो त समझा तर ग्ये पर जो अंगहीन वेकि ज्यूंदा छन चूंकि जिन्दगी न नर्क वे ग्ये समझा। क्या प्रदेश का नीति नियंता यीं बात पर कबि मंथन कनौ तयार होला। य फिर जनता यिनि यूं जानवरों को गुफ्फा बणद रैलि। सरकार चिन्ता त व्यक्त कर्दी छ पर यांसे क्वी फैदा। जब तक क्वी कारगर नीति नि बण्दी वन्य जीव मानव संघर्ष चल्द रालो। यीं बात पर मंथन कि जर्वत छ। एक बात त पक्की छ कि जैं रफ्तार से जंगली जानवर मानव बस्त्यूं कि तर्फ रूख कना छन त वख यानि जंगल मा सब कुछ ठीक नजर नि औणू छ। यानि जंगल कि आजाद जिंदगी छोड़ी व मनख्यों कि बस्ती मा एाकि जिंदगी खतरा डाली वो क्य प्रदर्शित कना छन। क्य तूं खुण वख भोजन कम पड़ गये। क्य वृंका वास्ता रैणै जगा नि बचीं छ। यानि क्वी न क्वी कारण जरूर छ। यां पर हमरा नीति नियंतों तैं विचार कन पड़लो।
य एक समस्या छ अर वो बि आम जनता का सरोकारों से जुड़ी जथगा जल्दी हवे सको यांको समाधान खोज लेण चयेणू छ। सरकार तैं वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं तैं रोकण वास्ता ठोस कदम उठाणा होला।
