(विश्वेश्र प्रसाद सिल्स्वाळ)
श्रीमती जी -चलो आज तीस साल बाद तुम मिते फ़िल्म दिखेण तो लावा. वो भी “धुरंधर ” पिक्चर. पुरानी याद ताज़ा ह्वे गे. पर आज क्य बात च यन.
श्रीमान जी -अरे त्यार जीजा को फोन आई छ्याई बल वू आणू आज मिलण खुणी द्वि बजि दिन मा.
श्रीमती जी -तुमार दिमाग़ खराब च. म्यार जीजा आणू अर तुम घारम तालु लगेक गायब. ब्वारि अर धरमु भी लेक आपर सुसराल ज्यां.क्या स्वाचल मेरी भूलिक जवें.
श्रीमान जी -अरे बिंडी गप्प मारदु कि मिन तुमरी स्याळी खुण दस लाख को हार ले, दस हजार की साड़ी, बेकार त्यार दिमाग़ चढ़े जांदु अर तब तू म्यार दिमाग़ खराब करदी.
श्रीमान जी -दो टिकट देना कार्नर की बेटे.
बुकिंग क्लर्क -वाह ताऊ, इब भी कार्नर सीट…
श्रीमान जी -तेरी समझ ना आ री कै . एक लेफ्ट कार्नर तो दूसरी राइट कार्नर की दे.
बुकिंग क्लर्क -ताऊ वो तो ठीक पर पिक्चर धुरंधर कल हट ली. आज तो गढ़वाली पिक्चर लाग री से दो बजे से. दे दूँ कै.
श्रीमान जी -मने बैरा से. तू दे बस..
श्रीमती जी -चलो बढ़िया आज “गढ़वाली पिक्चर दिखला “घंगतोळ ” पर तुमन सीट इतगा दूर दूर किले लेन.लेफ्ट कार्नर -राइट कार्नर
श्रीमान जी -ताकि तू यख भी नि कैरि “घपरोळ ‘
श्रीमती जी -मि तो घार जाणु फिर तुमि द्यायखो “घंगतोळ ” हर जगा यू आदिम इनि करदु घपरोळ…
श्रीमान जी -अरे म्यार टिकट को पैंसा तो बर्बाद ह्वे गेन.. हे ब्वे कन ठगयों मि फिर. आज……
