(कृतिजनक-दिनेश ध्यानी
समीक्षा-सुनील थपलियाल (घंजीर))
जै कृक्ति दगड़ि ‘बाल’ जुड़ि जांद वीं कृति को लेखन ताल अलग किस्मै मने जांद।
बाललेखन भौत विशेष मने जांद। जतगा सरल लग्दु च् उतगा हूंदु नी छ।बाल साहित्यो मनोविज्ञान भौत कुंगलु होंदु इलै परिपक्व बौद्विकतो इस्तमाल बालसुलभअबोधता थैन आहत कर सकदु अर बच्चों तैं साहित्य पाठन से विमुख बणै सकदु।
बालकथाँ कु सर्जन अफु थै बच्चा बर्णैकी हि करे जा सकेंद । बाल कहान्युं मा दिई सीख सिरप कागजी ज्ञान नि बंणि जाउ इलै बाल कथानक एबम विषयों मा अनावश्यक परिपक्व बौद्धिकता हावी नि होण चैंदि ।
बाल साहित्यलेखन’ नजर हटी दुर्घटना घटि’ जनि एक दशा है।
नै भाषा इस्कूल ….
– गढवलि भाषा का स्वयंसेवक एंव संघर्षशील योद्वा वरिष्ठ लेख्वार दिनेश ध्यानी जी की बालकहानि संग्रह ‘इस्कूल’ अनेक विशेषताओं अर जरसि खामियों का दगड़ि हमर हथ मा छ।
किताबै लौ याच् कि गडवलि भाषा मा बच्चों वास्ता ल्यखंणौ दुस्साहसी काम हुयूं च् । ई भाषा इस्कूल का 15 मास्टर (कानि) नौन्यालु तँ अपंगा खेत खल्यांणु
से जुड़ाव / समाजिक दशा कु ज्ञान व रिशता ‘नातों की सौ समाल / कर्म ही पूजा छ। भविष्य सुधरणें इमानदार मेनत लगन पर्यावरणीय चेतना आदि सीख भि दिंदन त् चिपको आंदोलन / रैणी गौं / गौरादेवी कु नौं खेल खेल मा बच्चों का मन मा बैठे दिंदन।
यदि इन मानिक चले जाउ कि कहान्युं की रचना छठी सातवीं कक्षाँ का 12-13 वर्षीय छात्र छात्राओं की मानसिक स्थिति तें ध्यान मा राखि करे ग्या त् उंका मुख से कुछ संवाद भारि भरकम व उमर से अगनै का लगदिन… जन कि …..
अपंणा जरसि लालचां खातिर पौन पंछी जीव जंतु डालि बोटि जड़ीबूटियों कु समूल नाश करण लग्यां छन । सरकार क्य करणि छ ?
– ‘भूखा बान मनिखि क्य क्य नि करदु !
– ‘पण सरकार जु राशन देंणि छ कम दाम पर वो भि कुछ हद तक यखा मनिख्यों तैं अपंणि खेती का प्रति उदासी कु कारण छ।
‘सरकार तैं यख हिमाचलै तर्ज फरें फलदार डालि अर नगदी फसल तैं बढावा देण पोड़लु।
‘जब सर्या लोग पाड़ बटि जाणा राला त यखा सुरक्षा भि खतरा मा पोड़ि जालि ‘..
ये सभि विशेष मत सम्मत संवाद बच्चों का मुख से सूणि की अचरज पैदा करदन ! अपरिपक्व उम्र मा परिपक्व ‘ जागरूकता मेल नि खांदि ।
कहानी लंबै मा सूक्ष्म सि छन जुकि बच्चों की रूचि बगैंक रखदिन ! छपै का बड़ा आखर पाठन मा सुगमता दिंदन। गडवलि पढे जाणु दुष्कर नि लगदु बल्कि सौंगु चितेंद।
चा जी जी
कहानि मा ब्वे बाबु की म्वन घटना तैं, ‘सटग गे’ ब्वले ग्या ज्यांसे म्वनै खबर माज्व मार्मिकता उठण चैंदि व कमजोर हे जांद।
बि जी जी
सरल भाषा/रोचक कथानक / बाल मनै उत्सुकता/नैतिक शिक्षा संदेश/ शिक्षा/कथानकु की चित्रात्मकता / बाल पात्रों का संवाद मा स्वाभाविकता /कहांनियों की लयताल व लंबै कु ध्यान धैरिकै विद्वत लेख्वार दिनेश ध्यानी जीन् इस्कूल की प्रतिष्ठा बणें की रखीं छ !
ना
नी जी
– सार योच कि एक युग का बाद अपंणु बचपन फिर से मीलि गे प्रतीत ह्वे।
दिनेश ध्यानी जी का ये रचनात्मक इस्कूल मा प्रवेश पैकि अंपणि पुरंणि यादगार इस्कुल्या पाटि फर घ्वट्या लगांणौ मौका मीलि गे। उम्रदराजी मा एकदफे फिर से जीवी स्वांणु निष्फिकरी बचपन हत लगि
मैसूस ह्वे.. इलै ई नै शिक्षाप्रद जगारूक व समृद्ध भाषा इस्कूल वास्ता दिनेश ध्यानी गुरजी कु धन्यवाद..
ड़ा
