गढ़वालौ पारंपरिक भोजन…
सयेली गढ़कुमाऊं क एक अभिनव रिवाज च. पहाडू मा आज की अमीरी मा बि बगैर सहयोग, सहकारिता क क्वी बि एक दिन नि रै सकद. सयेली सहकारिता अर सहयोग की मिसाल च बरखौं टैम फर (बरसात में) धाण (निराई गुडाई) एक जरोरात हुन्द त पहाडूं मा एक साथ कैक इक दस पन्दरा लोग धाण करदन अर ये रिवाज तैं सयेली बोले जांद।
जन की मैं तैं अपण कुदड़ (मंडूये के खेत) का दस पन्दरा फाम्गुन मा इक्छुटी धाण कराण होऊ त मि दस बार जननो अर मर्दुन तैं धनकुर (Labour
Barter system for farming or agricultural work or other works) कुणि बुलौलू अर फिर सौब एक
सयेली या सहेली मा बुखण
रौंद अर याँ से सौब आनन्द हेक धाण करणा रौंदन याँ से काम वि जल्दी होंदी अरें लोगूँ मनोरंजन बि होंद धनकुर वापस करे जांद (Returning of Labour days)
हाँ जब धन्कुयौँ तैं पलेक (थक) लगी जांद त सुखा बुखण/खाजा बँटे जांद
सुखो बुखण माने भुज्युं अनाज या दाळ . भुज्याँ बुखण मा भुज्यौँ भांग, तिल अर गुड़ अखोड़ बि डाले जांद.
साथ धाण करदन. दगड़ अम एक दौर्य या थ्कुल्या बि बुलाये जांद जू जागर लगाणु
साधारणतया सुखो या भुज्या बुखण क अनोज यी छन 1- भट्ट 2- मुंगरी 3- ग्युं 4- जुंडळ
5- मर्मू कवी कव्यार झन्र्याळ अर कौण्याळ वि प्रयोग होंद
