रंत रैबार ब्यौरों….
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ऐकि चल ग्ये, ये दिन पर तमाम संगठनों न गोष्ठी, कार्यशाला, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कैरी अपण होणो परिचै दिनी। यि सब कार्यक्रम शहरों का सभागारों मा आयोजित करे ग्येनि। ये मौका पर वक्तों न महिलों तैं सशक्त करौणो हर संभव प्रयास कनै वकालत करि। वक्तों न सरकारों से अपील करि कि वो कम से कम राजनीति मा महिलों तै एक निश्चित प्रतिशत भागीदारी को मौका द्या। यो बि बोले ग्ये कि अगर महिला अपण अधिकारों का प्रति जागरूक रैलि त वो एक अच्छी अर ईमानदार नागरिक साबित ह्वे सकद। यख तक बोलि कि अगर सत्ता महिलों का हाथ होंदो त आज दुनिया मा महायुद्ध नि होंदो। तर्क छौ कि चूंकि महिला स्वभाव से अपेक्षाकृत जादा उदार होंदन।
आज अगर द्यखे जाव त सरकारी विभागों मा व्याप्त भ्रष्ट आचारण का पिछनै पुरूष वर्ग कि तुष्टिकरण कि सोच काम कनी छ। ये सर्य परिप्रेक्ष्य मा कम हि महिला अधिकारी छन जौन सरकारी नियम कानून कि अनदेखी केरि होलि। बात चल्नी छ समग्र महिला समाज का उत्थान कि पर व्यखण मा औंद कि हर साल आठ मार्च खुण सभा-सेमीनारों मा वक्ता लोग गळा फाड़ी महिलों का विकास कि बात कर्दा नि थकदा पर सभागारों से भैर औदै वो सब कुछ भूतकाल कि बात ह्वे जांद। यानि सभा-सेमीनारों मा जो कुछ बोले जांद वींको असल जिंदगी से क्वी संबंध नि होंदो। य वी बात होंद कि कैबि विषै मा डिग्री प्राप्त कनु अलग बात छ अर वीतें व्यवहार मा ल्हाणु दुसरि बात।
