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रंत रैबार ब्यौरो…..
पलायन का कारण भले ही कथगै रिवाज पुरणा अर ब्यालि कि बात होंद जाणा छन पर पहाड़ी संस्कृति मा वृं अबि बि महत्वपूर्ण छन। यूं मद्दे एक परम्परा छ फूलदेई। फुलदेई ठीक ये हि मौसम को एक त्यौहार छ। कुदरत का बदलाव का दगड़ा दगड़ि मनखि बि अपण मन को हुलार प्रगट कर्ष। होरी निबटणा बाद चैतका मैना कि शुर्वात होंदै गौं कि (कुंवारी कन्या) छोटी-छोटी नौनी जंगलु अर पुंगड़ों का भीटों से फुल अपणि कण्ड्यिों मा ल्हेकि औंदन अर हर घर कि देल्यू मा सुबेर ल्हेकि डाली जन जीवन कि सुखमय कामनों कि सौंगत देंदन। चूंकि जुबान पर ऋतुरैण का गीत हॉदन। जोकों मतलब होंद किं देखा हम कुदरत मा फैल्यां फुलु तै ल्हेकि ऐ गया। ये देखा बांस अर रिंगाल कि कण्डियाँ मा सज्यां फुलु तै हर घर कि देल्यों मा घोल्ना छा। गीत समवेत स्वर पहाड़ों मा बसंत को आगमन भारी उमैलो हाँदा डाण्डा-कांठा बारा बानि का डाला बूतों मा अयां लाल-पीला अर सफेद फुल्वी खुशबू से महक जांदन। चौतर्फी डाला बूटा फुल्वी ऋतु से झक्क होयीं मिल्दन। सुबेर उठा त घर का आसपास माल्टा, नारंगी, आरू अर खुबानी का सफेद फुलु से उठदी सुगंध मनखि तैं अलौकिक भाव को अहसास करौंद। जंगलु मा चल जावा त फ्यूली का पिंगला फूल बाटा-घाटों का दिस्वालि अपणि छटा बिखेरी रखदन त ऐंच डाण्डों मा बुराश का लाल फुलु से पूरो इलाका लाल सुर्ख हवे जांदन।
बचपन मा नौना-नौनि श्याम वक्त जंगल य पुंगड़ों का भिटों से बनि बन्या फूल ल्हेकि औंदा छा जौंतै रात भर भैर पाला मा रखी सुबेर ल्हेकि गौं भर कि देल्यों मा धोल धोली यीं परम्परा तैं निभाँदा छा। तब परम्परा जना भारि शब्दों को ज्ञान नि रैंदो रै होलु पर लोग बड़ी बेसब्री से ये त्यव्हारै जग्वाल करदा छा। जौं देल्यों फूल धोल्दा छा वख भले ही द्वार बंद रैंदा होवन पर मन मा एक उल्लास रैंदो छौ। घर वला द्यखदा नि छा पर भावना य रैंदि छ कि जब घर का लोग सुबेर ल्हेकि द्वार खोलला त फुल्वी सुंगध से चूंकि भावनों मा बि नयि ऋतु का आगमन को गहन अहसास होलु।
खासतौर पर गढ़वाल क्षेत्र मा फुल्वी य ऋतु पूरा चैत मैना चल्द। पूरा मैना फुलदेई नियम से देल्यू मा फूल धोल्दी छै। अर तब औंदी छै फुलसंग्राद। वे दिन फुलेखूं तैं हर घर बटी गुड या पैसा मिल्दा छा। कबि चैत को मैना नवविवाहितों खुण मैत कि खुद ल्हेकि आँदो छौ। चैत को मैना पहाड़ कि जनान्यों खुण कथगा उमैलो अर खुदेड़ होंद। कथगै जगौं ये तिव्हार तैं सपरिवार मनै जांद। मैना भर पैलि जो ग्यों कि हर्याली कण्डियो मा ल्हे कि लोग गौं कि चौरि मा कठा वेकि वींकि पूजा कर्दन अर बाद मा वीं हर्याली तैं अपणि देल्यू मा धोल फूल संग्राद मनौंदन।
कुमाऊं क्षेत्र मा ये तिव्हार तैं भिंटोली बोले जांद। पैल्या टैम पर जब औण जाण अर सूचना आदान-प्रदान का कम साधन छा त मैत वला अपणि बेटी कि राजी खुशी पुछणो वीका सैसुर जांदा छा। अगर अफु नि जै सक्य त अपण औजी तैं भेजी बेटी कि कुशल क्षेम प्राप्त कर लेंदा छा। य परम्परा कमोवेश गढ़वाल-कुमाऊं द्विय माण्डलो कखि कखि अबि बि ज्यूदि छ। तब सैसुर वला ब्वारि का औजी मैत्यों तैं लत्ता कपड़ा, पैसा अर अनाज देकि बिदा कर्दा छा।
अब भले ही य परम्परा रस्मी भर रैग्ये हो पर ये तिव्हार से पहाड़ कि समृद्ध संस्कृति का आभास होंद। पहाड़ कि यीं रीत का भले ही वख अवसान होंद जाणू छ पर पलायन कैरी अंयां लोग आज बि मैदानंद यीं संस्कृति तैं ज्यूंदी रखणै कोशिश पर लग्यां छन। होण यो चयेणू छ कि पहाड़ी संस्कृति सि जुड्यां फुल्यात य फूलदेई तिव्हार तैं शासकीय मान्यता दिये जाव। यां से संबंधित जाणकारी अर महत्व से जुड्यू एक पाठ स्कूली पाठ्यक्रम मा शामिल करे जाव। यांसि जख औण वलि पीढ़ी तैं यांकि जाणकारी रैलि वखि पहाड़ी संस्कृति तैं जयूंदी रखे जै सकलु।
